एकता
सेवा
स्वाभिमान
अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा का आधिकारिक डिजिटल मंच, सदस्यता, सत्यापन, संगठन, नेतृत्व एवं सामाजिक विकास के लिए समर्पित है।
20K+
पंजीकृत सदस्य500+
ग्राम18+
राज्य100%
डिजिटल सेवापरिचय एवं इतिहास
जाट समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विकास यात्रा एवं सामाजिक पहचान के बारे में जानें
भारत में जाट समाज
भारत के विभिन्न राज्यों एवं क्षेत्रों में जाट समाज की उपस्थिति और सामाजिक विविधता की जानकारी
परंपराएँ एवं संस्कृति
जाट समाज की परंपराओं, गोत्र व्यवस्था, लोक संस्कृति एवं सामाजिक रीति-रिवाजों का परिचय
शिक्षा एवं योगदान
कृषि, शिक्षा, सामाजिक सेवा एवं राष्ट्र निर्माण में जाट समाज के योगदान की जानकारी
सामाजिक संकल्प एवं कार्ययोजना
कोई चन्दा नहीं - केवल सामग्री का सहयोग
महासभा का उद्देश्य आर्थिक चन्दे के स्थान पर सामग्री के सहयोग को प्राथमिकता देना है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार सेवा कार्यों में योगदान देने का अवसर मिले, यही हमारा संकल्प है। शिक्षा, स्वास्थ्य, जरूरतमंद परिवारों और जनकल्याणकारी कार्यों के लिए आवश्यक वस्तुओं के माध्यम से सहयोग की व्यवस्था विकसित करने का प्रयास किया जाएगा।
कोई चुनाव नहीं - सर्वसम्मति आधारित व्यवस्था
संगठन में आपसी एकता, अनुभव और वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन को प्राथमिकता देने का उद्देश्य है। 70 वर्ष की आयु के बाद के संरक्षक सदस्यों से गठित संरक्षक मण्डल महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श करके सर्वसम्मति से निर्णय लेने की व्यवस्था पर कार्य करेगा। इसका उद्देश्य संगठन में आपसी विश्वास, अनुशासन और सहयोग की भावना को मजबूत करना है।
किसानों की फसल - आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में सहयोग
किसानों को जैविक और गाय-आधारित खेती की ओर प्रोत्साहित करना इस योजना का प्रमुख उद्देश्य है। किसानों को प्राकृतिक संसाधनों के उचित उपयोग, मिट्टी की उर्वरता, कम लागत वाली खेती और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग के संबंध में जागरूक किया जाएगा। प्रशिक्षण, छोटी कार्यशालाओं और योजनाबद्ध सहयोग के माध्यम से किसानों को धीरे-धीरे अधिक आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जाएगा।
सामाजिक जागरूकता - वैवाहिक संस्कार एवं जिम्मेदारी
समाज की नई पीढ़ी को गोत्र व्यवस्था, विवाह संबंधी परंपराओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों और सामाजिक मूल्यों की जानकारी देना आवश्यक है। इसके लिए छोटी-छोटी संगोष्ठियों और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 10 वर्ष की आयु से ही बेटा-बेटियों को आपसी सम्मान, पारिवारिक संस्कार, उचित वैवाहिक निर्णय और सामाजिक समन्वय के विषय में समझाने का प्रयास किया जाएगा।
मृत्युभोज - सामाजिक सुधार एवं संवेदनशीलता
किसी बुजुर्ग या प्रियजन के निधन के समय परिवार पहले से ही दुख और मानसिक तनाव से गुजर रहा होता है। ऐसे समय में परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक और सामाजिक दबाव न पड़े, इस उद्देश्य से मृत्युभोज जैसी खर्चीली परंपराओं पर शांतिपूर्ण एवं संवेदनशील तरीके से विचार-विमर्श किया जाएगा।
समाज को सादगीपूर्ण विकल्पों, जरूरतमंदों की सहायता और शोकाकुल परिवार के साथ खड़े रहने के लिए प्रेरित किया जाएगा। धार्मिक, पारिवारिक और स्थानीय परंपराओं का सम्मान रखते हुए अनावश्यक खर्च को कम करने तथा मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देने की दिशा में जागरूकता बढ़ाना हमारा उद्देश्य है।