चौधरी शेर सिंह का सिंहावलोकन
जाट : इतिहास, गौरव एवं संगठन
जाट शब्द का अर्थ
पाणिनीय मूल 'जट' का अर्थ संघ से लिया गया है – “जटा जटँ संघाते”। जटा से ही जाट शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है। जाट एक गुणवाचक संज्ञा है। “जटिलं कार्यं करोति सः जाटः” अर्थात जो कठिन एवं जटिल कार्य करने में सक्षम हो वही जाट कहलाता है। इसी प्रकार “जागर्ति इति जाट्यम्” अर्थात जो सदैव जागरूक रहे वही जाट है।
पशुपालक एवं कृषक वर्ग को जाट जाति का मूल आधार माना गया है। साहस, स्वाभिमान, स्वावलंबन, समानता, सदाचार, स्वतंत्रता तथा स्पष्टवादिता इनके प्रमुख गुण हैं।
वीरता एवं परंपरा
जाट समाज अंधविश्वासों से दूर, परिश्रमी, प्रकृति प्रेमी, सामूहिकता एवं गणतांत्रिक व्यवस्था को अपनाने वाला समाज माना जाता है। जाटों की शूरवीरता के कारण अंग्रेजों ने अलग जाट रेजीमेंट की स्थापना की, जिसका ध्येय वाक्य रखा गया –
“जाट बलवान, जय भगवान।”
लोकप्रिय कहावत है –
“जाट जड़ूले मारिए।”
इतिहास एवं गौरव
जाटों ने अपनी मेहनत और आजीविका के बल पर अनेक राज्यों एवं साम्राज्यों की स्थापना की। राजस्थान के सुप्रसिद्ध कवि कृपाराम खिड़िया तथा कविराजा बाँकीदास आसिया ने भी जाटों की शक्ति, समृद्धि और स्वाभिमान का उल्लेख अपने काव्य में किया है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी अपने ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में जाटों के गुणों का उल्लेख किया है।
ऐतिहासिक उद्धरण
सन 1944 में अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के लॉयलपुर अधिवेशन में दीनबंधु सर छोटूराम ने जाटों के शौर्य, पराक्रम एवं बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
महाबला महावीर्या, महासत्य पराक्रमाः।
सर्वाग्रे क्षत्रिया जट्टा देवकल्पा दृढ़व्रताः।।
देवसंहिता के अनुसार जट्ट क्षत्रिय महाबली, पराक्रमी तथा देवतुल्य दृढ़ प्रतिज्ञा वाले हैं।
कार्ल मार्क्स ने भी अपने लेख (8 अगस्त 1853, न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून) में भारत तथा जाटों का उल्लेख किया है।
कर्नल टॉड तथा कर्नल निकलसन ने भी भरतपुर के जाटों की वीरता एवं गौरव का वर्णन किया है।
अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा
संस्कृत की उक्ति “संघे शक्ति: कलौ युगे” को आधार मानते हुए समाज के शिक्षित एवं दूरदर्शी नेताओं ने सन् 1907 में अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा का गठन किया।
यह एक गैर-राजनीतिक संगठन है जिसका उद्देश्य समाज को संगठित, शिक्षित एवं संस्कारित कर उसके अधिकारों की रक्षा करना है।
दीनबंधु सर छोटूराम सहित अनेक महान नेताओं ने सभा को दिशा प्रदान की तथा समाज में संगठन, शिक्षा और सहयोग की भावना को मजबूत किया।
महासभा के आठ संकल्प
1. संगठन को मजबूत करना एवं समाज में प्रेमभाव बढ़ाना।
2. शिक्षा, स्वास्थ्य, सदाचार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा नशा-मुक्ति को बढ़ावा देना एवं सामाजिक कुरीतियों का विरोध करना।
3. विवाह एवं अन्य सामाजिक आयोजनों में फिजूलखर्ची और दिखावे को रोकना।
4. प्राकृतिक एवं जैविक कृषि, जल संरक्षण तथा पशुपालन को बढ़ावा देना।
5. उद्योग एवं व्यापार की ओर अग्रसर होकर स्वावलंबन अपनाना।
6. समाज का प्रशासन, न्यायपालिका एवं व्यवस्थापिका में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
7. प्रकृति के निकट सरल एवं संतुलित जीवन अपनाना।
8. समय, परिस्थिति एवं समाज की आवश्यकता के अनुसार उचित निर्णय लेकर जड़ों से जुड़े रहना।
समापन संदेश
कृषि साथ जाट हाट पे,
ठाट लाट अधिराट।
एकहिं घाट बैठ के,
नित करो वेद पाठ।।
जय जाट बलवान।
जय जवान। जय किसान। जय विज्ञान।।